खाद्य तेलों का बन गया है रॉकेट

खाद्य तेलों के मूल्यों में लगातार बढ़ौतरी दर्ज की जा रही है कोई भी किसी किस्म का तेल इस तेजी से अछूता नही है फिर चाहे वो पाम आयल हो या फिर सूरजमुखी का तेल हो , सरसों का तेल हो या फिर सोयाबीन का तेल हो |

पिछले साल मार्च 2020 के रेट्स को देखें तो कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ चुकी हैं कुछ एक तेल तो ऐसे हैं जो अब दुगनी कीमत पर पहुँच चुके हैं | अब आम भारतीय घरों के लिए मसला खड़ा हो चुका है क्यूंकि एक मोटे हिसाब से आम भारतीय नागरिक साल भर में लगभग 19 किलो खाद्य तेल का उपभोग कर लेता है |अब तेल की कीमतें बढने के कारण रसोई का बजट बिगड़ने लगा है|

यदि हम खाद्य तेलों की बात करें तो इनका उपयोग सिर्फ रसोई घर में भोजन बनाने में नही होता है इसके अनेक कई और उपयोग भी हैं जैसे यह सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली , साबुन बनाने वाली और परफ्यूम बनाने वाली इंडस्ट्रीज का रॉ मटेरियल भी है | यदि वेजिटेबल आयल महंगा हो जता है तो इससे जुड़े वो सभी फिनिशड गुड्स महंगे हो जायेंगे जिनका उपयोग हम सभी अपनी दैनिक दिनचर्या में करते हैं|

समझे इस तेजी को और इसके कारणों को

सबसे पहले जिक्र करते हैं पाम आयल का जो देश व्यापी प्रयोग में की जाने वाली वास्तु है जो वैसे तो अदृश्य रहती है क्यूंकि इसे सीधे उपभोग नही किया जता है यह किसी न किसी रूप में हमारे अनेक फिनिश्ड गुड्स का रॉ मटेरियल में सहायक इनग्रेडिएंट के रूप में प्रयोग होता है |

पाम आयल एक सस्ता तेल है जो कि मुख्यत: मलेशिया और इंडोनेशिया से आता है | पिछले कुछ दशकों में यहाँ जंगलों को बड़े पैमाने पर साफ़ करके पाम आयल उत्पादन की व्यवस्था को स्थापित किया गया है |यहाँ इतने बड़े स्तर पर पाम की खेती की गयी है ताकि अधिक उत्पादन करके लगात को कम रखा जा सके | पूरे विश्व की खपत का 85% पाम आयल इन दोनों देशों में पैदा होता है |

इस उत्पदान का एक बड़ा हिसा हर साल भारत अपनी खपत के लिए खरीदता था | साल 2019 में भारत ने 90 लाख टन पाम आयल का आयात किया था और भारत खाद्य तेलों के उत्पादन में आत्म निर्भर होने की ओर अग्रसर है लेकिन अभी उत्पादन और खपत में बहुत बड़ा अंतर है जिसे पूरा करने में अभी समय लगेगा |

सूरजमुखी के तेल की बात करें तो रूस और यूक्रेन पहले नम्बर पर उत्पादक देश हैं जो की पूरी वैश्विक खपत का 50% उत्पादन करते हैं लेकिन इस साल इन दोनों देशों में सूखे की स्थिति रहने से सूरजमुखी का उत्पादन निर्धारित अनुमान से भी कम हुआ है | भारत हर साल बीस लाख चालीस हज़ार टन सूरजमुखी के तेल का आयात अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु करता है |इस साल तेल का उत्पादन कम होने की वजह से इसकी मांग बढने के साथ साथ इसके भाव मं भी तेजी आ गयी है |

सोयाबीन के तेल की स्थिति भी कुछ ऐसे ही कारणों की वजह से तेजी की ओर अग्रसर है क्यूंकि ब्राजील जो सोयाबीन के तेल का सबसे बड़ा देश है वहां भी सूखे की स्थिति के चलते उत्पादन में गिरावट दर्ज की गयी है और उधर चीन अपने सोयाबीन के स्टॉक को होल्ड करके बैठा है क्यूंकि पूरी दुनिया में लगे लॉक डाउन की वजह से मांग और आपूर्ति का चैनल गड़बड़ाया हुआ है | चीन अपनी घरेलू जरूरतों की आपूर्ति को भी सुनिश्चित करना चाहता है इसीलिए वो तेल का सुनिश्चित भडारण वाली नीति पर अडिग है लेकिन साथ ही कुछ तेल को चीन मेनगे दाम पर बेच कर अवसर का लाभ भी उठा रहा है |

सरसों का तेल भारत में बहुत पसंद किया जाता है क्यूंकि यह एक मात्र ऐसा खाद्य तेल हैं जिसके उत्पादन में किसी प्रकार के भी रसायन का प्रयोग नही होता है इसीलिए पूरी दुनिया में सभी सरसों के तेल को भोजन में प्रयोग करने के इच्छुक हैं | इसीलिए इस साल सरसों की खरीद शुरू होते ही सरसों के भाव में तेजी दिखाई देने लग गयी थी और सात हज़ार पिचहत्तर सौ रुपये और कहीं कहीं आठ हज़ार रूपए प्रति क्विंटल का भाव किसानों को मिला |

करोना काल में पूरी दुनिया में लोगों का ध्यान फैशन और ट्रेंड्स को किनारे करके शुद्ध और प्राकृतिक खाने की ओर केन्द्रित हुआ है | इसीलिए सरसों का तेल आम भारतीय के हाथों से फिसलता नज़र आ रहा है |

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