आम में अनियमित फलन के प्रबंधन में पैक्लोब्यूटराजाल की उपयोगिता

अनियमत फल आना एक समस्या

आम की अधिकतर व्यावसायिक किस्मों में अनियमित या एकान्तर फलन की समस्या होती है जिसमें एक वर्ष फल आता है और दूसरे वर्ष फल नहीं आता है। यदि आता भी है तो बहुत कम आता है जिससे प्रति इकाई आम की पैदावार बहुत कम हो जाती है। आम में अनियमित फलन के कारकों में वृद्धि नियामक (हारमोन्स) जिब्रेलिन्स का असंतुलन मुख्य है, जिसके फलस्वरूप फलदार वृक्ष भी अफलन की अवस्था में आ जाते हैं।

पैक्लोब्यूट्राजाल प्रतिवर्ष फलन एवं वृद्धि के नियंत्रण के लिए उपयोगी पाया गया है। यह एक पादप वृद्धि अवरोधक है जो जिब्रेलिन संश्लेषण एवं वानस्पतिक वृद्धि को कम कर पुष्पन में सहायक होता है। यह रसायन तने के जड़ों के द्वारा उपशिखर सकिय ऊतकों तक पहुँचता है जो इसकी मुख्य क्रिया की जगह है।

पैक्लोब्यूट्राजाल का प्रयोग

पैक्लोब्यूट्राजाल उपयोग करने के पहले बाग में उपयोगी एवं संस्तुति अन्तःशस्य क्रियाएँ करना आवश्यक होता है।

प्रति वृक्ष पैक्लोब्यूट्राजाल की मात्रा साधारणतया प्रति मीटर छाया क्षेत्र में 3.2 मिली. की दर से प्रयोग करते हैं। यह दर प्रति वृक्ष 32 मि.ली. से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि भूमि में बालू की मात्रा अधिक है तो पैक्लोब्यूट्राजाल की संस्तुत मात्रा में 50 प्रतिशत तक की कमी करना आवश्यक है। दशहरी आम में ऊपर वर्णित पैक्लोब्यूट्राजाल की मात्रा को दूसरे वर्ष प्रतिवृक्ष आधा कर देने से भी प्रभावी पाया गयाहै क्योंकि पैक्लोब्यूट्राजाल का अवशेष दो वर्ष से भी ज्यादा दिन तक मिट्टी में पाया गया है।

वृक्ष का छाया क्षेत्र दोपहर को 12 बजे आकलन करना चाहिए, इस समय प्रकाश की रोशनी बाहरी छाया क्षेत्र (कैनोपी) से सीधे आती है एवं छाया (शेड) की दूरी मुख्य तने से बाहरी छाया क्षेत्र की दूरी होती है इससे पैक्लोब्यूट्राजाल की मात्रा प्रति मीटर छाया क्षेत्र से निकाली जाती है। पैक्लोब्यूट्राजाल की संस्तुत मात्रा को 15 ली. पानी में मिलाकर मुख्य तने से 1.0-1.5 मीटर की दूरी पर जहाँ पोषक सकिय जड़ें स्थित हो, 15 से 20 से.मी. गहरी नाली पेड़ की गोलाई में बनाकर पैक्लोब्यूट्राजाल का घोल समान मात्रा में डालना चाहिए पैक्लोब्यूट्राजाल डालने के बाद उसको हल्की मिट्टी से ढक देना चाहिए। जिससे इस रसायन का वाष्पोत्सर्जन न हो पाये।पैक्लोब्यूट्राजाल प्रयोग के बाद कम से कम 25-30 दिन तक पेड़ के चारों तरफ की भूमि में पर्याप्त नमी रखनी चाहिए जिससे पैक्लोब्यूट्राजाल की अधिक से अधिक मात्रा का अवशोषण हो सके। यदि आवश्यकता हो तो बाग की हल्की सिंचाई भी की जा सकती है।

यदि वृक्ष की आयु 25 वर्ष से अधिक हो तो पैक्लोब्यूट्राजालकल्टार की संस्तुत मात्रा पानी में घोल कर दो भागों में बाँट लेना चाहिए एवं एक भाग मुख्य तने के पास गोलाई में बनी हुई नाली में तथा शेष भाग इस नाली से 1.0 मीटर दूर गोलाई में दूसरी नाली बनाकर मिट्टी में प्रयोग करना चाहिए। यदि वृक्ष 25 वर्ष से अधिक हो एवं उसका फैलाव ज्यादा हो तो तीसरी गोलाई 1.0 मीटर के अंतर पर और भी बना सकते हैं एवं पैक्लोब्यूट्राजाल को समान मात्रा में घोलकर तीन भाग में बांट कर डालना चाहिए इससे पैक्लोब्यूट्राजाल का अधिक से अधिक मात्रा में अवशोषण होता है।

यदि आम का बाग पथरीले तथा ढलान वाले क्षेत्र में हो तो गोलाई में बनी हुई नाली की जगह पर 15-20 गड्ढे बनाना चाहिए तथा पैक्लोब्यूट्राजाल का घोल एक समान मात्रा में इन गड्ढों में डाल कर मिट्टी से ढक देना चाहिए। प्रयोग का समय, जलवायु एवं आम की किस्म पर निर्भर है। सामान्यतया बौर निकलने के 90-00 दिन पूर्व, उत्तर भारत में सितम्बर से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में पैक्लोब्यूट्राजाल का प्रयोग अधिक उपयुक्त पाया गया है।

पैक्लोब्यूट्राजाल का प्रयोग देर में करने पर पर्णीय छिड़काव प्रभावी होता है जिन बागों में ज्यादा नमी रहती है। वहाँ भी पैक्लोब्यूट्राजाल के पर्णीय छिड़काव अधिक उपयुक्त पाया गया है। चूँकि पर्णीय छिड़काव में रसायन की मात्रा ज्यादा लगती है जिससे यह महंगा पड़ता है इसलिए इसकी संस्तुति नहीं की जाती है।

नियमित फलन वाली किस्मों को विस्तार से लगाने का बढ़ावा देना चाहिए। जिससे आम की पैदावार में बढ़ोत्तरी के साथ प्रत्येक वर्ष फल का आना सुनिश्चित हो

सावधानियां

  • पैक्लोब्यूट्राजाल का प्रयोग हाथ में दस्ताने एवं मुँह में मास्क पहन कर करें।
  • प्रयोग के समय धूम्रपान न करें और न कुछ खायें।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल से त्वचा व आँखों में हल्की जलज्न-हों सकता है। अतः इसके प्रयोग के बाद त्वचा एवं आँख को पानी से धो लें।
  • तालाब के पास के बागों में इसका प्रयोग कम करना चाहिए यदि करते हैं तो ऐसा प्रबन्ध होना चाहिए जिससे इस रसायन का अवशेष तालाब में न जाये जिससे तालाब के जलीय जीवों परइसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल के प्रयोग के बाद इसके खाली डिब्बों और इस रसायनिक तत्व से पानी के स्रोतों को दूषित न करें।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल की अधिक मात्रा के उपयोग से आम के बाग की मिट्टी की गुणवत्ता एवं इसमें पाये जाने वाले उपयोगी जीवों और वनस्पतियों के अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल की अधिक मात्रा के उपयोग से आम के पौधों के स्वास्थ पर बुरा असर पड़ता है। जिससे बागों के स्वास्थ के साथ-साथ पैदावार भी कम हो जाती है।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल की अधिक मात्रा के उपयोग से आम के बौर का आकार छोटा हो जाता है जिससे फलों के बैठने एवं गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल का उपयोग सही समय पर न करने से पुष्पन सही समय पर नहीं होता है। जिससे फलन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल द्वारा उपचारित बागों की मिट्टी में इसके अवशेष की मात्रा की जानकारी करनी चाहिए एवं इसकी मात्रा के आधार के अनुसार इस रसायन का प्रयोग करना चाहिए।
  • पैक्लोब्यूट्राजाल की ज्यादा मात्रा का प्रयोग करने से फल में इसके अवशेष मिलने की संभावना बढ़ जाती है जो कि आम के निर्यात को प्रभावित कर सकता है।
  • कल्टार प्रयोग से प्रति वृक्ष उत्पादकता में वृद्धि होती है अतः इस अतिरिक्त वृद्धि एवं पौधे के स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए उर्वरकों की संस्तुत मात्रा विशेषकर उपचारित पौधों में 25-50 प्रतिशत तक की वृद्धि आवश्यक है उपचारित पौधों में कार्बनिक उर्वरक का देना अनिवार्य है।

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रेफरेंस

प्रसार फोल्डर संख्या 1(2021) आलेख डॉ. वी. के.सिंह एवं डॉ. शैलेन्द्र राजन , प्रकाशक निदेशक भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान केंद्रीय उपोषण बागवानी संस्थान, लखनऊ एवं कृषि शिक्षा विभाग, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली

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